मेथी के गुण एवं उपयोग

मेथी के गुण एवं उपयोग (Methi Properties and Usage)

मेथी के पौधे की ऊंचाई 1-2 फीट, पान 3 पर्ण युक्त छोटा, खड़ा, कोमल, तेज गंध वाला, कुल लम्बे गोल दांतेदार फूल पत्र, कोपा में पीले रंग के वृन्त रहित फली 2 से 4 इंच लम्बी, 10 से 20 दाने वाली, बीज पीले और हरे भी होते है। मेथी का अंग्रेजी नाम और लेटिन Trigonella Foenum Graecum होता है। मेथी भारत के अनेक प्रान्तों में बोयी जाती है। मेथी के कोमल ताजा पत्तों का शाक बनता है और बीज का औषधी के रूप में प्रयोग होता है। मेथी के बीज यानि दानो का धरेलू प्रयोग सब्जी और लड्डू बनाने में भी किया जाता है, मेथी के दाने हरे और पीले दो रंगों में बाजार में मिलते है।

मेथी के गुण (Methi Properties)

मेथी स्वाद में कड़वी, विपाक-चरपरा, ऊष्णवीर्य, रुचिकर, ग्राही, दीपन पाचन है। यह बलवर्धक, शुक्रनाशक, वातहर, अर्श, उदरकृमि और क्षय का नाश करती है। मेथी वात प्रकृति और कफ प्रकृति वालों के लिए फायदेमंद है। मेथी का कार्यक्षेत्र मुखतः पाचन संस्थान है। मेथी में एक प्रकार का तैल स्फुराम्ल Phosphoric Acid होता है। यह द्रव्य वात नाड़ियो पर असर पहुँचाने वाले रहे है और इससे आफरा, उदारगूल, उदर में वायु भरा रहना आदि समस्याए दूर होती है। मेथी गर्भाशय का आकुंचन (सिकुड़न) कराती है, इस हेतु में अनेक प्रान्तों में प्रसव होने के पश्चात स्त्रियों को मेथी के लड्डू खिलाते है।

मेथी के उपयोग (Methi Usage)

1. मेथी के मोदक (Methi ke Laddu) – इसे बनाने के लिए के लिए ली जाने सामग्री पसंद एवं आवश्यकता के अनुसार बदल सकती है। इसमें हरड़, बहेड़ा, आंवला, सौंठ, काली मिर्च, पीपर, अजवायन, कलौजी, जीरा, शाहजीरा, धनिया, लौंग, दालचीनी, छोटी ईलायची के दाने, तेजपत्र, नागकेसर, जायफल, जावित्री अदि औषधियो में से आवश्यकता / उपयोग अनुसार सामग्री की 10-10 ग्राम मात्र लेते है। साथ ही मेथी 250 ग्राम, 25 ग्राम गोंद, 50 ग्राम नारियल की गिरी, 250 ग्राम गेहूँ का आटा, घी 250 ग्राम, पुराना गुड़ 625 ग्राम लेंते है। आटे को घी में भून लेते है, गोंद के छोटे-छोटे टुकड़े कर इन्हें भी घी में भून लेते है। औषधियों एंव मेथी को कूट लेते है और सूखे नारियल की गिरी को कस लेते है। इन सब को भूने गरम आते में मिलाकर 20-20 ग्राम के मोदक (लाडू) बना कर रख लेते है। इसमें से 1-1 मोदक सुबह-शाम वैद्य की सलाह अनुसार लिया जाता है।

यह कीटाणु नाशक होता है और इससे वात-प्रकोप (पेट में गैस की समस्या) नहीं होता है, कमर में बल आता है, पाचन क्रिया सबल होती है। मलावरोध नहीं होता है और शरीर सबल बनता है।

2. मेथीपाक (Methi Pak) – मेथी, सौंठ और घी 400-400 ग्राम, दूध 4 लीटर, पीपल, पीपलामूल, चिमकमूल, अजवायन, जीरा, धनिया, कलौंजी, सौंफ, जायफल, शठी, दालचीनी, तेजपत्र, काली मिर्च 120-120 ग्राम लेते है। दूध को उबाल कर पतली रबड़ी जैसा बनने पर सौंठ तथा मेथी का चूर्ण मिलाते है और फिर मावा बनाकर घी में भून लेंते है। इसके साथ औषधियों को पीस कर, कपडे से छान कर (कपड़छन) चूर्ण बना कर रख लेते है। तत्पश्चात 3.5 किग्रा शक्कर की दो तार की चासनी बना कर उसमें मावा एंव औषधियों का कपड़छन चूर्ण मिलाकर पाक बना लेते है।

यह पाक आमप्रकोप से पीड़ितों के लिए फायदेमंद है। वात और कफप्रधान रोगों पर प्रायोजित है। जीर्ण, आमवात, सब प्रकार के वात रोग, निर्बलता, पांडु, अपस्मार, अम्लपित्त, शिरोरोग, नेत्रदाह, प्रदर और सूतिका रोग के उपद्रव रूप वातरोग सबके लिए हितावह है। बल बढ़ाता है। वीर्य वृद्धि करता है। इसकी 40-40 ग्राम मात्रा सुबह-शाम वैद्य की सलाह से ली जाती है।

3. गालों पर शोथ (सूजन) – कनपेड़ा (Mumps) होने पर, वात प्रकोप से गालों पर सूजन आई हो तो मेथी और जौ के आटे को मट्ठे या नींबू के रस में मिलाकर दिन में 3-4 बार लेप करने से आराम मिलता है।

वैद्य जगदीश प्रसाद दुबे,
B.A.M.S. राष्ट्रीय आयुर्वेदिक संस्थान
सेवानिवृत्त जिला आयुर्वेद अधिकारी

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