संवत्सर की वैज्ञानिकता

संवत्सर की वैज्ञानिकता

कैसा अदभुत वण्डर – आकाश में टंगा कलैण्डर

समय का हिसाब रखना आज के मनुष्य के लिए कोई कठिन कार्य नहीं है। छपे कलैण्डर, हाथ में बंधी घड़ी, मोबाईल फोन, कम्प्यूटर, आदि अनेक साधन समय का हिसाब रखने में मनुष्य की मदद करने को तत्पर हैं। जब इनमें से कोई भी नहीं था तब भी हमारे बुजुर्गों ने आम आदमी को समय जानने का अद्भुत उपकरण उपलब्ध करा दिया था। अन्तर केवल इतना था कि प्राचीन काल में विकसित वह उपकरण आदमी के पास व्यक्तिगत रूप से उपलब्ध नहीं था। वह एक साझा उपाय था जो आकाश में टंगा था। उस सार्वजनिक साधन को दुनियाँ का कोई भी व्यक्ति कहीं से भी देख सकता था। उसी उपकरण को संवत्सर के नाम से जानते हैं। संवत्सर को एक ऐसा कलैण्डर माना जा सकता है जो आज भी आकाश में उसी तरह टंगा है जैसा हजारों वर्ष पूर्व टांगा गया था। वर्तमान में समय जानने के सरल साधन उपलब्ध हो जाने के कारण आम आदमी उसे देखना छोड़ दिया है।

समय के साथ बदलती ऋतुओं ने ही आदि मानव का ध्यान समय की ओर आकर्षित किया होगा। विश्व के विभिन्न भागों में मानव ने अपने अपने तरिके से समय को मापने के उपाय खोजने प्रारम्भ किए होंगे। भारत में ऐसे प्रयास वेदिककाल तक आते आते बहुत विकसित हो गए थे। भरत में विकसित कालमापन की पद्वति पर बाहरी प्रभाव को पूर्णतःनकारा तो नहीं जा सकता मगर इतना निश्चित है कि संवत्सर के रूप में कालमापन की भारतीय पद्वति सर्वथा मौलिक खोज है। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के अनुसार भारतीय ज्योर्तिविद नक्षत्र विद्या में अत्यन्त प्रवीण थे। समय मापन का ज्ञान बेबीलोन या यूनान से भारत नहीं आया था। समय मापन के ज्ञान का विकास वेदिककाल के बाद भी रूका नहीं, बाद में आर्य भट्ट, वराह महिर आदि ने भी इसके विकास योगदान दिया।

क्या है संवत्सर

प्रकृति में एक ऋतुचक्र के पूर्ण होने में लगने वाले कालखण्ड को भारत में संवत्सर नाम दिया गया। मोटे तौर पर देख जाय तो संवत्सर वह समय है जिसमें पृथ्वी सूर्य की एक परिक्रमा पूरी कर लेती है। यहाँ यह जानना उचित ही होगा कि संवत्सर केवल सूर्य केवल आश्रित नहीं होकर सूर्य, चन्द्रमा तथा नक्षत्रों तीनों की समन्वित स्थिति पर आधारित है। हमारे बुजुर्गों ने संवत्सर का आविष्कार बदलते मौसम की पूर्व सूचना पाने के उद्देश्य से किया होगा। मौसम की पूर्व सूचना के अभाव में खेतों में सही समय पर बुआई-कटाई आदि कार्य का होना संभव नहीं होता। ऐसी स्थिति में पर्याप्त उत्पादन के अभाव में लोगों के भूखे मरने की स्थितियां निरन्तर बनी होती। भारतीय संस्कृति का आधार स्तम्भ बने त्यौहार दिपावली, होली, मकर संक्रान्ति, बसन्त पंचमी जैसे ऋतु त्यौहारों की परम्परा भी नहीं बन पाती।

आज आम भारतीय के जीवन में संत्वसर का अर्थ जीवन के कुछ विषिष्ट अवसरों की तिथियां मुहुर्त तथा तीज त्यौहार का दिन जानने तक ही रह गया है। अंग्रेजी वातावरण में विकसित युवा पीढ़ी तो इसे काल मापन की रूढ़ीवादी विधि मानकर हेय दृष्टि से भी देखती है। सच यह है कि संत्वसर अनेकों ऋषियों के हजारों वर्षों के वैज्ञानिक अनुसंधान का परिणाम है। जिस समय वैज्ञानिक उपकरण के नाम पर मनुष्य के पास कुछ नहीं था तब मात्र अपने नेत्रों से किए गए अवलोकन तथा चिन्तन मनन से आविष्कृत संत्वसर किसी आधुनिक आविष्कार से कम नहीं है।

उत्तरायण-दक्षिणायन

संवत्सर के विकास की नींव उस दिन पड़ी होगी जब हमारे किसी बुजुर्ग ने ऋतुओं को पहचान कर उनकी अवधि व क्रम जानने का विचार किया होगा। कृषि के विकास के साथ इस क्रम को पहचानने की इच्छा ओर भी बलवती होगई होगी। इसी इच्छा से प्रारम्भ हुई खोजबीन से वर्षाऋतु से वर्षाऋतु तक के कालखण्ड को एक वर्ष के रूप में निरूपित किया गया होगा। यहाँ यह जान लेना उचित ही होगा कि पृथ्वी पर ऋतुओं होने का राज क्या है? क्या सभी ग्रहों पर ऋतुएं होती है? पृथ्वी पर ऋतुओं का होना उसकी मौलिक विशेषता है। पृथ्वी को सूर्य की कक्षा में रखते समय प्रकृति से एक भूल हो गई। पृथ्वी को उसके परिक्रमण पथ के लम्बवत नहीं रख कर 66 .5 डिग्री पर झुका कर रख दिया गया। वहीं भूल पृथ्वी पर ऋतुओं के बदने का कारण बन गई। शुक्र अपनी कक्षा में लगभग ठीक लम्बवत रखा हुआ है। वहां वर्ष भर एक ही ऋतु रहती है।

पृथ्वी के अपनी कक्षा में झुके हुए होने के कारण वर्ष में केवल दो दिन ही सूर्योदय ठीक पूर्व में होता है। शेष दिन सूर्य उत्तरी या दक्षिणी गोलार्द्ध में रहता है। पृथ्वी से देखने पर सूर्य छः माह उत्तर दिशा से दक्षिण दिशा की ओर तथा छः माह दक्षिण दिशा से उत्तर दिशा की ओर खिसकता नजर आता है। मध्य अवस्था से 23 .5 डिग्री उत्तर (कर्क रेखा) या दक्षिण (मकर रेखा) की ओर जाकर पुनः विपरीत दिशा में लौटने लगता है। संवत्सर में इस घटना को बहुत महत्व दिया गया है। सूर्य के दक्षिण से उत्तर की ओर खिसकने को उत्तरायण तथा उत्तर से दक्षिण की ओर खिसकने को दक्षिणायन कहते हैं। जब सूर्य उत्तरायण में होता है तो दिन लम्बे व रातें छोटी होने लगती है। जबकि दक्षिणायन की स्थिति में दिन छोटा व रात बड़ी होने लगती है।

सूर्य के दक्षिण से उत्तर तथा उत्तर से दक्षिण की ओर जाते समय केवल दो बार सूर्य अपने पथ के ठीक पूर्व दिशा में उदित होता दिखाई देता है। इसे सम्पात बिन्दु कहते हैं। दक्षिणी गोलार्द्ध से उत्तरी गोलार्द्ध में प्रवेश करते समय की घटना को बसन्त सम्पात तथा उत्तरी गोलार्द्ध से दक्षिणी गोलार्द्ध में प्रवेश को शरद सम्पात कहते हैं। सूर्य के सम्पात बिन्दु पर होने पर दिन व रात प्रत्येक 12 घन्टे होते हैं। दक्षिण की ओर बढ़ता सूर्य 22 दिसम्बर को सूर्य मकर रेखा को छूकर पुनः उत्तर की ओर लौटने लगता है। इसे ही उत्तरायण कहते हैं। उत्तर की ओर बढ़ता सूर्य 21 जून को कर्क रेखा को छूकर पुनः दक्षिण की ओर लौटने लगता है। इसे दक्षिणायन कहते हैं। 22 सितम्बर को शरद संपात तथा 22 मार्च को बसन्त होता है। बसन्त संपात के बाद की प्रथम तिथि (प्रतिप्रदा) को प्रत्येक संवत्सर व भारतीय नववर्ष का प्रथम दिन कहते है। इसे संपूर्ण देश में उत्साह पूर्वक मनाया जाता है। उत्तरायण की स्थिति मानव गतिविधियों के लिए अधिक अनुकूल होने के कारण ही इसे शुभ मानकर अधिकांश तीज त्योहार व खुशी के कार्य इसी अवधि में किए जाते हैं।

क्या हैं नक्षत्र व राशियाँ?

रात्रि आकाश में असंख्य तारे दिखाई देते हैं। चन्द्रमा, सूर्य तथा ग्रह सूर्य के सौर मण्डल में उपस्थित ग्रह एक दूसरे के समीप हैं। जबकी तारे हमसे बहुत दूर हैं। सूर्य व पृथ्वी का समीपतम तारा अल्फा सेन्टोरी की दूरी 4.25 प्रकाश वर्ष है। अन्य तारे हजारों लाखों प्रकाश वर्ष दूर हैं। पृथ्वी से आकाश में एक दूसरे से समीप दिखाई देने वाले तारे भी इसी प्रकार बहुत दूर दूर स्थित हैं। इनमें आपसी कोई सम्बन्ध भी नहीं होता मगर कई कई तारे मिलकर विषिष्ट आकृतियां बनाते दिखाई देते हैं। तारों से बने विभिन्न आकृतियों के तारामण्डलों का नामकरण अति प्राचीनकाल से ही किया जाता रहा है। पृथ्वी अलग अलग भागों में इन्हें अलग नाम दिए गए। वर्तमान में 78 तारामण्डलों को अन्तर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त है। सप्तऋषि मण्डल तथा मृगा मण्डल आकाश के सर्वाधिक परिचित तारामण्डल हैं। तारा मण्डलों के नामकरण से आकाष के किसी भी भाग में स्थित पिण्ड स्थिति को बताना उसी तरह आसान हो गया जैसा हम अपने घर का पता महाद्वीप, देश, प्रदेश, गाँव, शहर, गली, मुहल्लों के नाम के आधार पर बता देते हैं।

निरन्तर प्रेक्षणों से प्राचीनकाल में यह जाना गया कि सूर्य व चन्द्रमा एक वर्ष में आकाश में वृताकार पथ पर एक परिक्रमा पूर्ण कर लेते हैं। इस खोज के बाद मनुष्य ने ऋतुओं व आकाश मार्ग पर सूर्य व चन्द्रमा की स्थिति में सम्बन्ध बैठाने का प्रयास किया होगा। इसी प्रयास के अन्तर्गत भारत के किसी ऋषि ने आकाश में चन्द्र पथ पर बराबर दूरी पर 27 स्थान चिन्हित किए होगें। यह कार्य ठीक वैसा ही था जैसा रेल मार्ग पर स्टेशन बनाने का है। स्टेशन के आधार पर किसी भी समय गाड़ी की स्थिति बता सकते हैं। आकाश में सौर पथ पर स्थित इन 27 चिन्हों को किसी तारे या तारा समूह से पहचान तथा नाम दिए गए। इन्हें ही ऩक्षत्र कहते हैं। नक्षत्रों को किसी वृताकार रेल पथ के 27 स्टेशन माना जा सकता हैं। बेबीलोन वालों ने इस पथ पर 12 स्टेशनों की कल्पना कर 12 तारा मण्डलों से इनकी पहचान दी। जिन्हें हम राशियाँ कहते हैं। पृथ्वी से देखने पर 365 दिन में सूर्यादय इन 12 राशियों या 27 नक्षत्रों की पृष्ठ भूमि में होता दिखाई पड़ता है। सूर्योदय एक माह तक एक राशि में होता दिखाई देता है। यदि नक्षत्र को ध्यान में रख कर बात करें तो सूर्य लगभग 13 दिन एक नक्षत्र क्षेत्र में उदय होता दिखाई देता है। इस विभाजन के कारण आकाश में सूर्य या चन्द्रमा की स्थिति को देख कर ऋतु का अनुमान लगाने की वैज्ञानिक पद्धति विकसित कर ली गई।

12 राशियों के नाम-
1. मेष      5. सिंह        9. धनु
2. वृष      6. कन्या    10. मकर
3. मिथुन  7. तुला       11. कुम्भ
4. कर्क    8. वृष्चिक  12. मीन

27 नक्षत्रों के नाम-
1. अश्विनी       10. मघा               19. मूल
2. भरणी         11. पूर्व फाल्गुनी    20. पर्व आषाढ़
3. कृतिका      12. उत्तरा फाल्गुनी 21. उत्तरा आषाढ़
4. रोहिणी       13. हस्त               22. श्र्रवण
5. मृगशिर      14. चित्रा               23. धनिष्ठा
6. आद्र्रा       15. स्वाती              24. शतभषा
7. पुनर्वसु      16. विशख              25. पूर्व भाद्रपद
8. पुष्य          17. अनुराधा           26. उत्तरा भाद्रपद
9. आश्लेषा    18. जेष्ठा                27. रेवती

शुक्ल व कृष्ण पक्ष

चन्द्रमा में स्वयं का प्रकाश नहीं है। चन्द्रमा की चमक उसकी सतह पर गिरने वाले सूर्य के प्रकाश के कारण होती है। पृथ्वी से देखने पर सूर्य व चन्द्रमा दोनों ही पृथ्वी की परिक्रमा करते प्रतीत होते हैं। चन्द्रमा सूर्य से कुछ तेज चलता है इस कारण अमावस्या को दोनों साथ होते हैं तो पूर्णिमा को 180 डिग्री के कोण पर। अमावस्या को चन्द्रमा का चमकता भाग पृथ्वी से विरीत दिशा में होता है इस कारण चन्द्रमा पृथ्वी पर दिखाई नहीं देता। जबकि पूर्णिमा पर चन्द्रमा का सम्पूर्ण चमकता भाग पृथ्वी की ओर होता है इस कारण पूर्ण चन्द्र दिखाई देता है। पूर्णिमा से सूर्य व चन्द्रमा की कोणीय स्थिति में परिवर्तन होता है इस कारण चन्द्रमा के चमकता क्षेत्र क्रमश: कम होता जात है और अमावस्या पर चन्द्रमा लुप्त होजाता है। पूर्णीमा के बाद से अमावस्या के 15 दिन की अवधि को कृष्णपक्ष कहा जाता है। अमावस्या के बाद से चन्द्रमा को चमकीला भाग फिर दिखने लगता है और निरन्तर बढ़ता जाता है और पूर्णिमा पर पूर्ण चन्द्र दिखाई देता है। इस अवधि को शुक्ल पक्ष कहते हैं। इस तरह पक्ष एक वैज्ञानिक ईकाई है तथा दो पक्षों के मिलने से माह भी एक वैज्ञानिक ईकाई है।

भारतीय महीनों के नामकरण की पद्धति भी पूर्णतः वैज्ञानिक है तथा विश्व में अन्यत्र देखने को नहीं मिलती। महिनों के नाम आकाश में लिख दिए गए हैं। पूर्णिमा को चन्द्रमा जिस नक्षत्र में होता हैं उस नक्षत्र के नाम पर महीने का नामकरण किया गया है। जिस पूर्णिमा को चन्द्रमा मघा नक्षत्र में होता है उस माह का नाम मघा तथा श्रवण नक्षत्र में होने पर श्रवण कहा जाता है।

भारतीय महिनों के नाम-
1. चैत्र        5. श्रावण    9. मार्गशीर्ष
2. वैशाक   6. भाद्रपद  10. पौष
3. जेष्ठ      7. आश्विन  11. माघ
4. आषाढ़ 8. कार्तिक 12. फाल्गुन

टूटती तिथि की वैज्ञानिकता

संवत्सर में प्रतिदिन की तिथि देखने हेतु चन्द्रमा का उपयोग किया गया। भारतीय पंचाग में तिथि एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय तक चलती है। जिस दिन चन्द्रमा सूर्य के साथ उदय होकर सूर्य के साथ ही अस्त होता है उसे अमावस्या कहते है। जिस दिन चन्द्रमा सूर्यास्त के बाद उदय होता है उसे पूर्णिमा नाम दिया गया। आकाश में चन्द्रमा का पथ वृताकार होने के कारण 360 अंश का होता है। एक माह में 30 दिन होने के कारण इसे 30 बराबर भाग में बांटने से प्राप्त एक भाग 12 अंश को होता है। चन्द्रमा के अपने पथ पर 12 अंश चलने को एक तिथि माना गया है। यह वैज्ञानिक विभाजन है। चन्द्रमा आकाश में सदैव एक समान चाल से नहीं चलता। कभी 19 घन्टे में 12 अंश चलता है तो कभी इसी दूरी को तय करने में 26 घन्टे ले लेता है। इस कारण तिथि परिवर्तन प्रति दिन सूर्यादय के समय नहीं होकर दिन में किसी भी समय हो हो सकता है। इस कारण एक ही दिन में दो तिथियाँ भी हो जाती है।

एक ही दिन में दो तिथियों का होना व्यवहार की दृष्टि से उचित नहीं जान पड़ा तो यह तय किया गया जो तिथि होगी उसे ही पूरे दिन की तिथि माना जाएगा। इस नियम के कारण जब कोई तिथि 24 घन्टे से लम्बी होती है तो एक ही तिथि में दो सूर्योदय हो जाते है और दो दिन एक ही तिथि रहती है। इसके विपरीत कोई दूसरी तिथि सूर्योंदय के बाद प्रारम्भ हुई तथा छोटी होने के कारण अगले सूर्याेदय से पूर्व समाप्त हो जाती है। इस कारण इसकी गिनती नहीं हो पाती । इसे ही तिथि का क्षय होना या तिथि टूटना कहते है। यह स्थिति असुविधाजनक भले ही हो मगर है वैज्ञानिक। आकाश में चन्द्रमा की स्थिति तथा चन्द्रमा की कला देखकर बिना कलेण्डर व घड़ी के समय व तिथि का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।

वार नहीं है प्राकृतिक आधार

तिथि के साथ वार गिनने का प्रचलन विश्व के सभी कलेण्डरों में है। रविवार से शनिवार तक सात दिन होते है। वार का किसी प्राकृतिक पिण्ड से सीधे सीधे कोई संबन्ध नहीं मिलता। प्राचीन भारत में वार नहीं थे। इनका समावेश बाद में बाहरी प्रभाव के रूप में हुआ। इसका प्रमाण अमावस्या के मासिक अवकाश के रूप में आज भी देखा जा सकता है। रविवार के साप्ताहिक अवकाश की परम्परा भी इसके साथ ही आई।

अधिक मास व क्षय मास

चन्द्रवर्ष ( 354 दिन ) तथा सौरवर्ष ( 364 दिन ) में प्रतिवर्ष पड़ने वाले 10 दिन के अन्तर को प्रति तीसरे वर्ष एक अधिक मास बना कर दूर दिया गया। इस कारण संवत्सर का ऋतुओं के साथ सम्बन्ध बना रहता है। भारतीय चन्द्रमास का नियम यह है कि जिस माह जो संक्रान्ति (सूर्य का एक राषी सीमा से निकल कर दूसरी राशी सीमा में प्रवेश करना) हो उसी नाम पर माह का नाम होता है। इस कारण जिस माह में कोई संक्रान्ति नहीं हो उस माह का कोई नाम नही होता तथा वह पूर्व वाली संक्रान्ति के नाम पर ही जाना जाता है। अर्थात निरन्तर दो माह का एक ही नाम होता है। इसे ही अधिक मास कहते है। इसके अगले एक माह में दो संक्रान्तियां हो जाती है। एक माह के दो नाम तो हो नहीं सकते अतः एक माह के नाम को छोड़ना पड़ता है। इसे ही क्षय माह कहते हैं। इसमें भी पूर्ण वैज्ञानिक दिखाई देती है।

नक्षत्रों का तड़का

संवत्सर केवल सौरचन्द्र वर्ष ही नहीं है। इसे रूचिकर व प्रमाणिक बनाने के लिए बुर्जुगों इसमें नक्षत्रो का समावेश भी कर दिया है। कार्तिक अमावस्या पर स्वाती नक्षत्र में ही दिपावली पूजन किया जाता है तो होलिका दहन फाल्गुन नक्षत्र में किया जाता है। कृष्ण जन्माष्टमी रोहिणी नक्षत्र में तो रामनवमी आद्रा नक्षत्र में मनाई जाती है। एक ही त्यौहार का एक ही देश में भिन्न भिन्न मनाया जाना असुविधा जनक भले ही हो मगर अवैज्ञानिक नहीं है। भारत जैसे विशाल देश में सभी स्थानों पर सूर्योदय का समय समान नहीं होता अतः एक ही दिन देश के दो भागों में दो भिन्न तिथियाँ होने से तिथि के अनुसार मानाए जाना वाले त्यौहार अलग अलग दिन हो सकते हैं।

क्या है अयनांश

अनन्त आकाश में पृथ्वी की कितनी गतियाँ है ? इस अनुमान लगाना आज भी असंभव सा है। अभी तक जिस कलैण्डर की चर्चा हमने की वह पृथ्वी की दैनिक गति व वार्षिक गति के कारण है। पृथ्वी की एक गति और है जिसका समावेष नहीं करने पर उपरोक्त कलैण्डर का ऋतुओं के साथ सम्बन्ध बिगड़ जाता है। वेदिककाल में बसन्त संपात अग्रहायन (अग्राहायन, हायन का अर्थ वर्ष से है) माह में होता था इसी कारण वेदिककाल में संवत्सर का प्रथम माह अग्रहायन या मार्गषीर्ष माना गया। गीता में कहा गया है मासानाम मार्गशीर्षोऽम। यह ईसापूर्व 4000 वर्ष के लगभग की घटना होगी। वर्तमान में बसन्त संपात चैत्र में होता है इस कारण चैत्र को संवत्सर को प्रथम माह माना जाता है। शुक्लपक्ष को शुभ मानने के कारण शुक्ल प्रतिपदा को वर्ष का प्रथम दिन माना जाता है। अयनांश में परिवर्तन पृथ्वी की अक्ष के पीछे खिसकने के कारण होता है। पृथ्वी की काल्पनिक अक्ष 23 .5 डिग्री झुकी होने के साथ साथ वृताकार पथ पर पीछे भी खिसकती रहती है।

भारत के विभिन्न भागों में विभिन्न कलेण्डर को अपनाया जाना किसी को अवैज्ञानिक लग सकता है मगर देखा जावे तो यह हमारे पूर्वजों की वैज्ञानिकता को ही प्रमाणित करता है। अन्य देशों में पृथ्वी की वार्षिक गति को ध्यान में रख कर ही कलेण्डर बनाए गए मगर भारतियों ने पृथ्वी की अक्ष के घूर्णन को ध्यान को ध्यान में रख कर उससे तारतम्य बैठाने के प्रयास किए। इस प्रयास में ही अलग कलैण्डर बनते गए मगर मूलभूत रूप से सभी में साम्य दिखाई देता हैं।

पृथ्वी की जलवायु सूर्य पर निर्भर करती है। पृथ्वी की विशिष्ट स्थिति एवं सूर्य से मिलने वाली ऊर्जा पर ही ऋतुएं होती है। यह भी बहुत संम्भव है कि पृथ्वी की अक्ष के घर्णन का प्रभाव भी उसके दीर्घकालीन जलवायु जैसे हिमयुग या गर्मकाल के रूप में सामने आता होगा। स्वामी युक्तानंद गिरी को कहना है कि सतयुग,त्रेतायुग द्वापर व कलयुग के चक्र का सम्बन्ध लगभग 24000 वर्ष में पृथ्वी की अक्ष के एक वृत पूरा करने से है। वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी की धुरी लगभग 25800 वर्ष में एक वृत पूरा कर लेती है। इस कारण बसन्त सम्पात प्रतिवर्ष लगभग 20 मिनिट 24.58 सैकण्ड पहले होजाता है। वेदिक काल में अगहायन माह में होने वाला बसंन्त सम्पात अब चैत्र में होने लगा है तथा भविष्य ओर पीछे खिसक जाएगा। पृथ्वी की धुरि के खिसकने का असर ध्रुव तारे पर भी पड़ता है। घ्रुवतारा किसी एक तारे का नाम नहीं है। जो तारा पृथ्वी की अक्ष की सीध में होता है वही उत्तरी आकाश में स्थिर दिखाई देता है। पृथ्वी की अक्ष के खिसकने के साथ ध्रुव की स्थिति वाला तारा भी बदलता रहता है। अभी पोलेरिश तारा ध्रुव स्थिति में है मगर 5000 वर्ष पूर्व अल्फा डेकानिस ध्रुव तारे की भूमिका में था। 5500 वर्ष बाद अल्फा सेफी तारा ध्रुव की स्थिति में होगा।

जीवन्त वर्ष संवत्सर

संवत्सर मात्र समय नापने की इकाई भर नहीं है अपितु आम भारतीय के धार्मिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन को स्पन्दित करने वाला एक महत्वपूर्ण घटक है। वर्तमान में जब हमारा दृष्टिकोण अर्थ प्रधान हो गया है तब प्रशासनिक दृष्टि से संवत्सर कुछ परेशानी उत्पन्न करता प्रतीत होता है मगर व्यक्ति के जीवन में खुशियां भरने का यह प्रयास किसी भी दृष्टि से अवैज्ञानिक नहीं है। पश्चिमी सौर कलैण्डर अधिक सुविधा जनक लगता है मगर हर दिन को नए रूप् में देखने की क्षमता उसमें नहीं है। यहीं कारण है प्रशासनिक एवं आर्थिक क्षेत्र में सौर कलेण्डर पर पूर्णतः आश्रित होजाने पर भी हमारे सामाजिक,धार्मिक तथा सांस्कृतिक कार्य संवत्सर के अनुरूप ही चलते है। अपने जीवन की निरसता को समाप्त कर हर दिन को नए रूप में देखने का प्रयास करते व्यक्ति की मदद संवत्सर आकाशीय पिण्डों की हर दिन बदलती स्थिति दिखा कर करता है। आवश्यकता इस बात की है हम बहुत मेहनत से तैयार किए गए प्राकृतिक वर्ष संत्वसर को संभाल कर ही नहीं रखे अपितु ऋषियों के अनुसन्धान को आगे बढ़ाकर इसे ओर भी युक्तियुक्त बनाने का प्रयास करें। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में भारतीय कलैण्डर की दृष्टि से भी अनुसंधान किया जाना चाहिए। लेखक भारतीय कलैण्डर का विशेषज्ञ नहीं होकर एक जिज्ञासु है तथा जिज्ञासावश जानने के प्रयास में जो जान पाया वही जानकारी विद्यार्थियों हेतु प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।

विष्णु प्रसाद चतुर्वेदी

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