शरीर के जीवाणु Bacteria in Human Body

जीवाणु

दंतमंजन व साबुन के विज्ञापनों से ऐसा लगता हैं कि जीवाणु तुच्छ जीव हैं। जीवाणुओं को सरलता से नष्ट किया जासकता है। नए अनुसंधानों से ज्ञात हुआ है कि मानव शरीर के ऊपर व अन्दर पाए जाने वाले सूक्ष्मजीवों की संख्या हमारी अब तक की सोच की तुलना में बहुत अधिक है। हम अपने शरीर में 1000 खरब से अधिक जीवाणु बसाते हैं। संख्या की दृष्टि से बात करें तो एक व्यक्ति के शरीर में उपस्थित कोशिकोओं में 90 प्रतिशत जीवाणु कोशिकाएं व केवब 10 प्रतिशत मानव कोशिकाएं होती हैं। मानव शरीर में उपस्थित जीवाणु कोशिकाओं का भार 5 पाउण्ड के लगभग आंका गया है। केवल मुँह में ही जीवाणुओं की कई सौ प्रजातियां स्थाई रूप से निवास करती हैं। हर दाँत का अलग परितन्त्र होता है। हमारे इन नन्हें साथियों का हमारे जीवन में बहुत हस्तक्षेप होता है, मगर हम लगभग बेखर रहें हैं। अब मानव शरीर में जीवाणुओं की भूमिका पर व्यापक तलाश प्रारम्भ हुई है।

मानव शरीर में जीवाणुओं की भूमिका के विषय में खोज 1998 में अचानक ही प्रारभ्म हुई थी। स्टॉनफोर्ड विश्वविद्यालय के संक्रमित रोग विशेषज्ञ डॉक्टर डेविड रेलमान दाँतों की नियमित जाँच हेतु दन्तचिकित्सक के पास गए थे। दन्तचिकित्सक ने उनके दाँत खुरच कर मैल बाहर निकाला तो डॉक्टर रेलमान उसमें से कुछ मैल अपने साथ ले आए। डॉक्टर रेलमान ने अपनी प्रयोगशाला में जब डीएनए श्रखंला प्रौद्योगिकी विधि से उस मैल की जाँच की तो आश्चर्यचकित रह गए। उनके दन्तमैल में 31 प्रकार के जीवाणु उपस्थित थे। सबसे बड़ी बात यह थी कि वे ऐसे जीवाणु थे जिन्हे वैज्ञानिकों उससे पूर्व देखा नहीं था। डॉक्टर रेलमान ने कहा कि उनको भूमि या समुद्र से तो जीवाणुओं की कई नई प्रजातियां मिलने की आशा थी मगर मानव शरीर से इतने नए प्रकार के नए जीवाणु पाने की तनिक भी उम्मीद नहीं थी। डॉक्टर रेलमान ने जाने पहचाने मानव शरीर के जीवाणुओं का डीएनए श्रखंला प्रौद्योगिकी विधि से अध्ययन करने की आवश्यकता प्रतिपादित कर दी।

डॉक्टर रेलमान की सलाह को अन्तर्राष्ट्रीय विज्ञान जगत ने गम्भीरता से लिया। मानव शरीर के बाहर व अन्दर पाए जाने वाले सम्पूर्ण जीवाणु समूह को खोज निकाला गया है। जीवाणु बिना हानि पहुँचाए हमारे शरीर में रहते हैं। अधिकांश जीवाणु मित्रता निभाते हैं। कुछ जीवाणु कभी कभी मानव शरीर के हितों के विपरीत कार्य कर उसे रोगी बनाते हैं। मानव शरीर में पाए जाने वाले सभी जीवाणुओं को एक स्थान पर एकत्रित किया जावे तो आकार यकृत से भी बड़ा होगा। वैज्ञानिकों का मानना है कि जीवाणु मानव शरीर के एक अतिरिक्त अंग की तरह कार्य करते हैं।

प्रत्येक मानव शरीर का अपना अलग सूक्ष्म-जीवोम (सूक्ष्मजीव समूह) होता है। किसी मानव शरीर के सूक्ष्म-जीवोम का विकास उसके जन्म के साथ ही प्रारम्भ होता है। मानव सूक्ष्म-जीवोम का विकास, व्यक्ति की आनुवांशिकता, उसके खानपान व बाह्य सम्पर्कों से प्रभावित होता है। कुत्ता, बिल्ली या धूल से सम्पर्क या प्रतिजैविक औषधि का उपयोग व्यक्ति के सूक्ष्म-जीवोम को प्रभावित करते हैं।

रोबर्ट कोच द्वारा रोगों में सूक्ष्मजीवों की भूमिका प्रतिपादित करने के बाद से यही माना जाता रहा है कि जीवाणु मानव शरीर के दुश्मन है। पेट में मरोड़ पैदा करने से लेकर भोज्य विषाक्तता तक सभी प्रकार की खुरापतों का जिम्मेदार जीवाणुओं को माना जाता रहा है। नई खोज हमारी सोच में परिवर्तन कर रही है। जीवाणुओं को अब परस्पर लाभ का साथी माना जाने लगा है। स्वस्थ रहने वाले व्यक्ति अपने प्रारम्भिक जीवाणु साथियों का जीवनभर साथ निभाते हैं।

विज्ञान-अनुसंधान के नए क्षेत्र का उदय

मानव शरीर के सूक्ष्म-जीवोम के विषय में अभी तक प्राप्त जानकारी 242 स्वस्थ्य व्यक्तियों के शरीर से प्राप्त जीवाणुओं पर आधारित हैं। इन जीवाणुओं को व्यक्तियों की त्वचा, मुँह, नाक, आहरनाल, स्त्री जननांग आदि से प्राप्त किया गया था। विज्ञान एक प्रश्न का उत्तर खोजती है तो उसके साथ ही सैकड़ों नए प्रश्न उत्पन्न होजाते हैं। मानव शरीर में उपस्थित जीवाणुओं की खोज ने प्रश्नों का गुबार खड़ा कर दिया है।. बात अज्ञात को जानने की जिज्ञासा से बहुत आने बढ़ गई है। वैज्ञानिक अब मोटापा, अस्थमा, एलर्जी. ग्लूटेन असहिष्णुता, औषधि-प्रतिरोधकता आदि का समाधान मानव शरीर में रहने वाले जीवाणुओं में खोजने लगे हैं।

एक स्वस्थ व्यक्ति की आहरनाल से प्राप्त सूक्ष्म-जीवोम का आंकड़ा ही 1000 खरब से अधिक का है। यह संख्या मानव शरीर में मानव कोशिकाओं की संख्या से अधिक है। एक विज्ञान लेखक ने तो पुस्तक लिखकर यह बताने का प्रयास किया है कि हम 10 प्रतिशत ही मानव हैं। मानव सूक्ष्म-जीवोम का विश्लेषण करना किसी भी कम्प्यूटर के लिए आसान बात नहीं है। अब वैज्ञानिक रोगी व्यक्ति, जिसमे प्रतिजैविक औषधियों का अच्छा खासा उपयोग किया हो, के सूक्ष्म-जीवोम का अध्ययन करना चाहते हैं।

मानव शरीर के सूक्ष्म-जीवोम की खोज के बाद मानव शरीर को अन्तरिक्ष व समुद्र के समान विशाल माना जाने लगा है। वैज्ञानिक मानव शरीर को अलग अलग भागों में बांट कर उसके जीवाणुओं का अनुसंधान करने जुटे हैं। विज्ञान की नई शब्दावली सामने आने लगी है। स्टानफोर्ड के महामारी विशेषज्ञ डॉक्टर जुलिए पर्सोनेट तो सूक्ष्मजीव वैज्ञानिकों को, अन्तरिक्ष अनुसंधार्थियों के लिए प्रयुक्त ऑस्ट्रोनॉट शब्द की तर्ज पर, माइक्रोबोनॉट पुकारने लगे हैं।

बदलने लगी है प्रतिजैविक की परिभाषा

डॉक्टर रेलमान कुछ भिन्न प्रकार से ही सोच रहे हैं। वे जानना चाहते हैं कि एक जीवाणु दूसरे जीवाणु से तथा अपने परपोषी से किस प्रकार संवाद करता है? डॉक्टर रेलमान की कल्पना है कि यह सम्पर्क विशिष्ट अणुओं के माध्यम से किया जाता है। जीवाणु निरन्तर कुछ अणु परपोषी कोशिका को भेजता रहता है। इन अणुओं में ही केंसर या अन्य संक्रमण का राज छिपा हो सकता है। डॉक्टर रेलमान का कहना है कि अच्छे प्रतिजैविक और कुछ नहीं होकर जीवाणु विनाश के संदेश वाहक होते हैं। स्पष्ट है कि सभी जीवाणुओं द्वारा प्रतिजैविक अणुओं का निर्माण किया जाता है। वैज्ञानिक लम्बे अर्से से प्रतिजैविक अणु बनाने वाली नई जीवाणु प्रजातियों को खोजते रहे हैं। दूर नहीं जाकर अब वैज्ञानिकों अपने शरीर में ही झांकने लगे हैं। जैव-इंजिनियर माईकल फिशबैक कहते है कि हमारे शरीर में उपस्थित जीवाणु सैकड़ों प्रकार के अणुओं का संश्लेषण करते हैं। हमें अपने सूक्ष्म-जीवोम का अध्ययन करना चाहिए जिससे हम अपने शरीर की, किसी जीवाणु कोलोनी का उपयोग, स्वस्थ रहने के लिए या रोगों को ठीक करने में कर सकें।

व्यवहार बदल सकते हैं जीवाणु

परजीवी जीवाणु प्रजाति, टोक्सोप्लाज्मोसिस गोन्डीई, में परपोषी जीव के व्यवहार को बदलने की क्षमता देखी गई है। यह परजीवी जीवाणु प्रजाति बिल्ली के शरीर पर ही प्रजनन करती है। घर में रहने वाले चूहे जब इस परजीवी जीवाणु प्रजाति से संक्रमित होते हैं तो चूहों के व्यवहार में परिवर्तन होता है। चूहे बिल्ली की परवाह कम करने लगते हैं। चूहों के व्यवहार में हुए इस परिवर्तन असर यह होता है कि वे आसानी से बिल्ली की पकड़ में आने लगते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि जीवाणु यदि चूहे के व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं तो मानव व्यवहार को क्यों नहीं प्रभावित कर सकते? संभव है कि किसी जीवाणु प्रजाति के प्रभाव से बैंगन की सब्जी भी आपको भिण्डी जितनी स्वादिष्ट लगने लगे।

प्रतिजैविक औषधियां बढ़ाती है मोटापा

स्टानफोर्ड के वैज्ञानिक इस बात का अध्ययन कर रहे हैं कि मानव शरीर में मोटापा लाने में सूक्ष्म-जीवोम की क्या भूमिका होती है? वैज्ञानिकों का अनुमान है कि पिछले कई दशकों से मानव अपने खाने-पीने की आदतों में परिवर्तन करता रहा है। इन परिवर्तनों ने मानव के सूक्ष्म-जीवोम को भी परिवर्तित किया होगा। इससे भोजन के पचने तथा ऊर्जा उत्पन्न करने कि क्रियाओं में बदलाव आया होगा। बहुत संभव है कि उसे भूख भी अधिक लगने लगी हो।

जोह्न होपकिन्स के जनस्वास्थ्य विभाग में एकलाख साठ हजार बच्चों पर किए गए एक अनुसंधान के अनुसार, बचपन में खाई गई प्रतिजैविक औषधियां (एन्टीबायोटिक्स), आगे जाकर शरीर संहती सूचांक (BMI) को बढ़ा सकती हैं। प्रतिजैविक औषधियां शरीर में हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करने के साथ साथ शरीर के लाभदायक जीवाणुओं को भी नष्ट कर देती हैं। इसका विपरीत प्रभाव पाचनक्रिया पर होता है और शरीर अधिक कैलोरी ग्रहण करने लगता है।

पूर्वजैविकों (प्रोबायोटिक्स) का प्रभाव

अनजाने में सही, मगर स्वास्थ्य सुधार हेतु पूर्वजैविकों का प्रयोग मानव प्राचीनकाल से करता रहा है। पूर्वजैविकों का अर्थ दही, छाछ आदि उन खाद्य पदार्थों से है जिनमें लाभदायक जीवाणु उपस्थित होते हैं। पूर्वजैविक शरीर में उपस्थित जीवाणुओं को मदद करते हैं। इनसे मानव पाचन क्रिया में मदद मिलती है। कुछ लोगों का मानना है कि प्रतिजैविक औषधियों के प्रयोग से नष्ट होने वाली जीवाणु क्षति की पूर्ति पूर्वजैविकों के उपयोग से होती रहती है। पूर्वजैविकों के विषय में अभी अधिक अध्ययन नहीं हुआ है। कुछ वैज्ञानिकों को तो इस बात पर भी सन्देह है कि पूर्वजैविक पदार्थ लाभकारी हैं। इतना अवश्य है कि पूर्वजैविक किसी प्रकार की हानि नहीं करते। किसी विशेष प्रकार का भोजन शरीर में उपस्थित जीवाणु समूहों के लिए लाभकारी होने की बात भी अभी सन्देह के घेरे में हैं।

मानव शरीर में पूर्वजैविकों की भूमिका के विषय में संशय अब जल्दी ही दूर होंगे। मानव शरीर के सूक्ष्मजीवोम में जिज्ञासा उत्पन्न होने के बाद अनेक वैज्ञानिक अपने स्वयं या परिवार के सदस्यों पर अनुसंधान करने लगें हैं। लॉरेन्स बर्कले राष्ट्रीय प्रयोगशाला के सूक्ष्मजीव वैज्ञानिक जैनेट जानसन का कहना है कि, जब भी वे सूक्ष्मजीवोम संगोष्ठी से लौटते हैं तो, वे अपने भोजन की सूची में कुछ परिवर्तन करते हैं। जैनेट जानसन प्रतिरोधी मण्ड (रेजिसटेन्ट स्टार्च) का उपयोग भी करने लगें है जिससे उनके पेट के जीवाणुओं को पर्याप्त भोजन मिलता रहे। जैनेट जानसन यह मानते हैं कि खानपीने की आदतों में थोड़ा परिवर्तन करके हम अपने पेट के जीवाणुओं को प्रसन्न रख सकते हैं। पेट के जीवाणुओं की प्रसन्नता में ही अपनी प्रसन्नता निहित है। स्टानफोर्ड के सूक्ष्मजीव वैज्ञानिक लेस डेथ्लेफ्सेन भी अपने स्वयं के सूक्ष्मजीवोम में रुचि लेने लगे हैं। डेथ्लेफ्सेन ने अपने दैनिक भोजन में फलों व सब्जियों की मात्रा बढ़ा दी है। कई अन्य सूक्ष्मजीव वैज्ञानिक अपने सूक्ष्मजीवोम को स्वस्थ्य रखने हेतु प्रतिजैविक औषधियों के प्रयोग से बचने लगे हैं।

प्रतिऑक्सीकारी संरक्षण

ग्लूटाथियोन की आणविक संरचना

प्रतिऑक्सीकारी (एन्टीओक्सीडेन्ट) के प्रति आम लोगों की जानकारी बढ़ गई है। आम लोग भी जानते है कि प्रतिऑक्सीकारी शरीर में उत्पन्न विषैले पदार्थों को नष्ट करते हैं। प्रतिऑक्सीकारी शरीर की प्रतिरक्षी क्षमता को बनाए रखते हैं। इसी कारण बाजार में खाद्य पदार्थों को बेचने हेतु उनके प्रतिऑक्सीकारी युक्त होने का प्रचार किया जाता है। अब वैज्ञानिकों ने ज्ञात किया है कि मानव आहरनाल, यकृत व मलाशय में रहने वाली कुछ जीवाणु प्रजातियां शरीर के प्रमुख प्रतिऑक्सीकारी ग्लूटाथियोन के स्तर को नियमित बनाए रखते हैं। वैज्ञानिक, ग्लूटाथियोन उत्पन्न करने वाले जीवाणुओं को पोषित करने वाले, पूर्वजैविकों को खोजने के प्रयास में हैं। यदि इसमें सफलता मिलती है तो उपापचय की गड़बड़ से होने वाली बीमारियों जैसे डायबीटीज-2 आदि को भोजन की आदतों में बदलाव कर नियन्त्रित किया जाकेगा।

विषाणु धूसर पदार्थ

जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है कि मानव शरीर पर पाए जाने वाले सूक्ष्मजीवों की संख्या व विविधता से प्रभावित सूक्ष्मजीव वैज्ञानिक मानव शरीर की तुलना अन्तरिक्ष से करने लगे हैं। अन्तरिक्ष अनुसंधान के समान्तर शब्दावली का प्रयोग जीवविज्ञान में करने लगे हैं। एक नया शब्द बना है विषाणु धूसर पदार्थ ( वाइरल डार्क मेटर) । माना जाता है कि प्रकृति में दिखाई देने वाले पदार्थ के साथ ऐसा पदार्थ भी पाया जाता है जो दिखाई नहीं देता उसे ही धूसर पदार्थ कहते हैं । इतना प्रगति करने के बाद भी विज्ञान धूसर पदार्थ के विषय में अधिक नहीं जानता। 16 स्वस्थ मानवों की त्वचा पर पाए जाने वाले विषाणुओं के डीएनए (वाइरोम) की आधुनिक विधियों से जॉच करने पर पाया गया कि इनमें से अधिकांश विषाणु (वाइरस) विज्ञान के लिए अज्ञात है। इसका सीधा अर्थ यही है कि अन्य स्थानों पर पाए जाने वाले विषाणुओं के विषय में सबकुछ जानने का दावा करने वाले वैज्ञानिक अपने स्वयं के शरीर पर उपस्थित विषाणुओं के विषय में कुछ नहीं जानते हैं। मानव त्वचा पर उपस्थित इन अज्ञात विषाणुओं को ही विषाणु धूसर पदार्थ कहा गया है।

विषाणु धूसर पदार्थ अनुसंधान एक कठिन विषय है। मानव त्वचा पर से खुरचे मैल के नमूने में डीएनए की जॉच करने पर अधिकांश भाग मानव डीएनए व जीवाणु डीएनए का होता है। इसमें विषाणु डीएनए को खोजना भूसे के ढ़ेर में सूई ढ़ूढ़ने जैसा है। पेनिसिल्वेनिया विश्वविद्यालय के त्वचीयरोगविज्ञान की सहायक वैज्ञानिक एलिजावेथ ग्राइस का कहना है कि जब मानव त्वचा को स्वास्थ रखने में जीवाणुओं की भूमिका महत्वपूर्ण मानकर त्वचीय-सूक्ष्मजीवोम का अध्ययन किया जाने लगा है तो त्वचा-वाइरोम का अध्ययन करना भी आवश्यक हो जाता है।

विज्ञान लेखक कार्ल जिमर ने एक पुस्तक ए प्लेनेट ऑफ वाइरसेज लिख कर मानव जीवन में विषाणुओं की भूमिका को पुनः स्थापित किया है। विषाणु, पृथ्वी पर जीवन का सरलतम रूप है। विषाणु पृथ्वी के पर्यावरण में जल, थल व वायु सभी जगह उपस्थित होते हैं। बहुत गहरी खानों में भी विषाणु पाए गए हैं। सूक्ष्म आकार के कारण विषाणु दिखाई नहीं लेते मगर संख्या बल बहुत अधिक है। जुखाम जैसा साधारण रोग उत्पन्न करने वाले विषाणुओं ने मानव के नाक में दम कर रखा है। ईबोला जैसे विषाणु तो कभी कभी ऐसा आतंक फैलाते हैं कि मानों मानव जाति को विलुप्त करके ही दम लेगें।

दुश्मन का दुश्मन दोस्त

कार्ल जिमर ने अपनी पुस्तक ए प्लेनेट ऑफ वाइरसेज में विषाणुओं के मानव हितकारी पक्ष की ओर ध्यान आकर्षित किया है। कुछ विषाणु जातियां जीवाणुओं को संक्रमित कर उन्हे मार डालती है। डॉक्टरों द्वारा प्रतिजैविक औषधियों का आवश्यकता से अधिक उपयोग करने के कारण जीवाणुओं में प्रतिजैविकों के प्रति प्रतिरोधकता उत्पन्न होती जा रही है। इस कारण जीवाणु जन्य रोगों का उपचार करना कठिन होता जा रहा है। भारत के चार प्रमुख मेडीकल कॉलेजों द्वारा एकत्रित आंकड़े बताते हैं 50 प्रतिशत लोगों में उच्च स्तर की प्रतिजैविक औषधियों के प्रति प्रतिरोधकता उत्पन्न होगई है। इससे नवजात शिशु अधिक प्रभावित हैं। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद की निदेशक डॉ.सौम्या स्वामीनाथन के अनुसार अनेक चिकित्सक यह नहीं जानते कि कौन सी प्रतिजैविक औषधि कब लिखी जानी है। बुखार व गले के 80 प्रतिशत संक्रमण विषाणु जन्य होते हैं जिनमें प्रतिजैविक औषधियां प्रभावी नहीं होती फिर भी चिकित्सक लिखते हैं। प्रतिजैविक औषधियों के अनावश्यक उपयोग का अन्दाज इस समाचार से लगाया जा सकता है कि यमुना के जल में प्रतिजैविक औषधियों के अंश पाए गए हैं।

कार्ल जिमर ने दुश्मन का दुश्मन दोस्त की तर्ज पर प्रतिजैविक औषधियों से नहीं मरने वाले जीवाणओं के विरुद्ध जीवाणु भोजी (बैक्टिरियो फेज) का उपयोग करने की सलाह दी है। जीवाणु भोजी वे विषाणु हैं जो जीवाणु कोशिका को संक्रमित कर उसे मार डालते है। जीवाणु भोजी मानव कोशिकाओं को हानि नहीं पहुँचाते। कार्ल जिमर ने इसे फेज थिरेपी कहा है मगर रोगो का जैव-नियन्त्रण नाम से यह अवधारणा पहले से ध्यान में रही है। फेज थिरेपी का भविष्य क्या होगा इसकी कल्पना अभी नहीं की जासकती। फिलहाल अमेरिकी सरकार ने जिमर के सुझाव को गम्भीरता से नहीं लिया है।
सहयोग या प्रतियोगिता

महान भौतिक शास्त्री लार्ड रुदर फोर्ड ने एक बार कहा था कि हर विषय या तो भौतिकी होता है या फिर सूचनाओं का संग्रह । लार्ड रुदर फोर्ड के दृष्टिकोण से देखे तो मानव सूक्ष्मजीवोम अभी बहुत ही प्रारम्भिक अवस्था में है। अनेक प्रकार की सूचनाओं को एकत्रित करके कई पुस्तके इस विषय पर लिखि जा चुकी है मगर किसी निष्कर्ष पर पहुँचना अभी शेष है। पुस्तक- आई सुपरओर्गेनिज्म के लेखक जोनाथन टर्नी भारत के शिक्षा संस्थानों में भाषण भी देकर गए हैं। प्रमुख प्रश्न यह कि हमारे शरीर में उपस्थित सूक्ष्मजीव परितन्त्र को कैसे संरक्षित रखा जावे?

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर केल्विन फोस्टर इस प्रश्न के उत्तर में कहते हैं कि हमारे अन्दर उपस्थित सूक्ष्मजीव एक जंगल-परितन्त्र की तरह है। ऑक्सफोर्ड के वैज्ञानिकों ने एक गणितीय मॉडेल से यह समझाने का प्रयास किया है कि सैकड़ों जीवाणु प्रजातियां मानव शरीर में एक साथ सफलता पूर्वक कैसे रह लेती हैं? फोस्टर कहते हैं कि हमारे शरीर की जीवाणुजातियां एक दूसरे की सहयोगी नहीं होकर प्रतिद्वन्दी होती है। जैसे घने जंगल में पादप प्रजातियों के मध्य प्रतियोगिता के कारण निम्न स्तर की प्रजाति किसी उच्च स्तर की प्रजाति से प्रतिस्थापित की जाती रहती है। इस प्रतिस्थापन से ही परितंत्र स्थायित्व की ओर बढ़ता है। मानव शरीर के आन्तरिक परितन्त्र का स्थायित्व ही व्यक्ति के अच्छे स्वास्थ्य का आधार होता है। केल्विन फोस्टर का अध्ययन अनुसंधान पत्रिका साइन्स में प्रकाशित हुआ है।

सूक्ष्मजीवोम अध्ययन का महाभियान

पिछले 20 वर्षो में विकसित हुई डीएनए श्रखंला प्रौद्योगीकी ने पृथ्वी पर सूक्ष्मजीवों की भूमिका को नए रंग से रेखाकिंत किया है। इससे प्रभावित होकर वैज्ञानिकों का एक बड़ा समूह जीवाणु, कवक, विषाणु, शैवाल आदि सूज्क्ष्मजीवों का अध्ययन नए सिरे से करना चाह रहा है। विषय की गम्भीरता का अंदाज इस समाचार से किया जा सकता है कि अमेरिका के 50 संस्थानों ने यूनिफाइड माइक्रोबायोम इनिशिएटिव कर्न्सोटियम बना कर सामूहिक अध्ययन करने का निर्णय किया है। संस्थान यह जानने का प्रयास करेगें कि सूक्ष्मजीव आपस में, परपोषी से तथा वातावरण से संवाद कैसे करते हैं? इस 10 वर्षीय योजना का लाभ मानव स्वास्थ्य, ऊर्जा व कृषि आदि क्षेत्रों को मिलने की आशा की है। निष्कर्ष रूप में कहा जासकता है कि सामान्य साधनों से नहीं दिखाई देने वाला सूक्ष्मजीवों का संसार आज वैज्ञानिक अध्ययन चहेता बन गया है। अभी जीवाणओं को दुशमन बताने वाला बाजार आने वाले समय में ओम जीवाणुवाय नमः का जाप करने लगे तो आश्चर्य नहीं होगा।

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